परिचय

चंद्रप्रकाश देवल

गांव में पले-बढे़ चंद्रप्रकाश देवल की आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा अपने स्‍वर्गीय दादा भैरव सिंह दधवाडि़या के सान्निध्‍य में हुई। आपके दादा पुरानी राजस्‍थानी (डिंगल) और उसकी वाचिक परम्‍परा में निष्‍णात थे। आंख खुलते ही अपने आसपास के परिवेश में आपका साक्षात्‍कार हुआ- चलती चाकियों के साथ गाये जाते ‘हरजस’ के बोलों में दौड़ती कविता से। पर्व-अनुष्‍ठानों पर गाती स्त्रियों के गीतों में आवेष्टित कविता से।  रावणहत्‍थे की  स्‍वर लहरी और चित्रों को देखने के कौतुक के बीचे भोपे द्वारा ‘पड़’ बांचने के स्‍वरों में दुबकी कविता से। आदिवासी गवरी नृत्‍य में गाये जाने वाले गीतों में छिपी आदिम कविता से। ‘रतजगो’, ‘जागरणों’ में संगीत की जुगलबंदी करती कविता से। आपके चारों ओर कविता के नानाविध रूप और घटाएं थीं, लोक और शास्‍त्रीय दोनों रूप में प्रचलित। ऐसे वातावरण में अपने गुरु के सिखाये छंदों को कण्‍ठस्‍थ करते और उन्‍हें दुहराते-दुहराते देवल के चित्‍त में कविता का अंकुरण हुआ, पर यह अजीब था कि आपने छंदोबद्ध कविता पर कभी कलम नहीं चलाई।

विश्‍वविद्यालय में अध्‍ययन के दौरान आपके भीतर घुमड़ते भावों की छुटपुट अभिव्‍यक्ति हुई हिन्‍दी में, पर विधिवत् कविता लेखन का कार्य सातवें दशक में मातृभाषा राजस्‍थानी के माध्‍यम से आरंभ हुआ। दोनों माध्‍यमों में अपने कवि को परखने के बाद अपने समकालीन साथी लेखकों से घंटों बहस-मुवाहिसे के बाद आपने जाना कि मातृभाषा का माध्‍यम ही अभिव्‍यक्ति को असली ताकत देता है। अपने परवर्ती लेखकों गणेशलाल व्‍यास उस्‍ताद और विजयदान देथा के लेखन से प्रेरणा लेकर परम्‍परा में प्राप्‍त राजस्‍थानी भाषा को नये लेखन के अनुरूप बनाने की चुनौती के साथ अपनी अनुभव-सिद्ध जिद को अंगीकार कर आपका पहला काव्‍य-संग्रह ‘पागी’ आया।

राजस्‍थानी की नई कविता के प्रारंभिक दौर में यह एक महत्‍वपूर्ण काव्‍य-संग्रह गिना गया, जिसने देवल को अपनी एक खास पहचान दी। अपनी कथावस्‍तु की बहुस्‍तरीयता, अपने समकालीन समय की निर्मम पड़ताल करती और उसके अनुरूप अपनी काव्‍य-भाषा के निर्माण की योग्‍यता के कारण, इस संग्रह को 1979 में साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया।

एक लम्‍बे अंतराल के बाद 1989 में देवल का दूसरा चर्चित काव्‍य-संग्रह ‘कावड़’ आया, जिसका काव्‍यानुभव कवि की पिछली रचनाओं से अलग नहीं कहा जाए, तब भी वह अपेक्षाकृत शांत पर तीखी बंधक क्षमता के कारण पाठकों के मानस में सीधा उतरने वाला माना गया। यह संग्रह राजस्‍थानी के प्रसिद्ध कथाकार विजयदान देथा द्वारा लिखी गई भूमिका के कारण भी चर्चित रहा। इस संग्रह की कविताओं में सत्‍ता, व्‍यवस्‍था और आम आदमी के त्रिस्‍तरीय समीकरणों के राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक पक्षों से अन्‍तर्सम्‍बन्‍धों की छानबीन और परख जैसे कवि के खास हेतु बन गए, जिन्‍हें देवल ने अपने व्‍यंग्‍य-विधान और मर्मघाती कटाक्षों की सहायता से उजागर किया।

अपने तीसरे कविता-संग्रह ‘मारग’ में देवल की उपस्थिति तीन स्‍तरों पर स्‍पष्‍ट देखी गई- कवि, चिंतक और दर्शक के रूप में। अपने रचनाकर्म मे आप रचनाकार, पाठक और आलोचक की तीनों भूमिकाओं की संश्लिष्‍टता के सहारे अपनी खोज-यात्रा जारी रखते हैं और सामाजिक यथार्थ के सत्‍य को सहज उजागर करते हैं। धार्मिक वर्चस्‍व के आच्‍छन्‍न अधार्मिकता का प्रतिरोध करते हुए, गंवई जीवन-स्‍तर, लोक-संस्‍कृति और लोक-जीवन की कठिनाइयों की पड़ताल करती देवल की ये कविताएं दरअसल ‘बैंलेस’ और ‘कण्‍ट्रास्‍ट’ की कविताएं सिद्ध हुईं। इस संग्रह में एक नया प्रयोग भी था, एक ही केन्‍द्रीय प्रतीक ‘मारग’ के माध्‍यम से सारी बातें कही गई थीं।

देवल का कवि यहीं नहीं ठहरा। अपनी भाषा में अच्‍छी आलोचना की अनुपस्थिति के चलते वह अपनी ही रचनाओं का विश्‍लेषक बना गया। अपने बने-बनाये रचनात्‍मक ताने-बाने को निरंतर तोड़ता-संवारता रहा। ‘तोपनामा’ नामक अगला काव्‍य संग्रह इस बात का प्रमाण है। अपने शिल्‍प से एक और नितान्‍त नये शिल्‍प की तलाश में देवल ने अपने ही द्वारा अर्जित भाषा-मुहावरे को तोड़ा, फिर घड़ा।

1998 में ‘राग-विजोग’ के प्रकाशन के पश्‍चात् पाठकों-आलोचकों ने पाया कि अब पानी थोड़ा निथरने लगा है, देवल का कवि अब अपेक्षाकृत शांत, धीमा और सहज होकर एक साथ संयोग और वियोग को निरपेक्ष भाव से निहार सकता है। वह प्रेम की संवदेना और भावना को मनुष्‍य की मुक्ति-चेतना से जोड़कर देखता है। नये भाव-बोध और नये संस्‍कार को अपनी काव्‍य-भाषा में दीक्षित करने की छटपटाहट भरी चेष्‍टाएं अभी भी आपकी कविताओं में स्‍पष्‍ट देखी जा सकती है, पर यह निर्विवाद है कि देवल अपने बिम्‍ब-विधान और कल्‍पनाशील चिंतन से अपनी कविताओं में अपना रंग भरते हैं। इन्‍हीं खूबियों के चलते राजस्‍थानी कविता को सही अर्थों में आधुनिक बनाने में चंद्रप्रकाश देवल की सर्जनात्‍मक क्षमता का महत्‍वपूर्ण योगदान है। देवल का 2003 में काव्‍य-संग्रह ‘उडीक पुरांण’ तथा 2008 में काव्‍य-संग्रह ‘झुरावौ’ आया।

इसी बीच आपका कवि-रूप हिंदी में भी प्रकट हुआ। अपने आरंभिक कविता-संग्रह ‘आर्त्‍तनाद’ के बाद आपको हिंदी कव‍ि के रूप में स्‍थापित करने वाली आपकी कृति ‘बोलो माधवी’ 1995 में आई। महाभारत के उद्योगपर्व में गा‍लव विषयक आख्‍यान का आपने अपने काव्‍य का विषय बनाया। आपके गहरे सामाजिक बोध ने इस पौराणिक स्‍त्री-चरित्र की त्रासद स्थितियों को समकालीन पीड़ा में रूपायित किया। आप अपनी काव्‍य-ऊर्जा से उन सारी विसंगतियों और विडम्‍बनाओं पर प्रहार करते नजर आते हैं, जिनके रहते एक प्राणन्ति मानुषी उपभोग के निर्जीव उपकरण में बदल जाती है। राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी, उदयपुर ने आपको सर्वोच्‍च ‘मीरा पुरस्‍कार’ से सम्‍मानित करते हुए इस कृति के लिए कहा कि यह पौराणिक आख्‍यान से सनातन संदर्भ जोड़कर रचा गया नारी की अस्मिता का उत्‍थापक प्रबंध-काव्‍य है।

एक ही केन्‍द्रीय प्रतीक अथवा विषय को लेकर उस पर अपनी अलग-अलग काव्‍यात्‍मक प्रतिक्रियाओं के द्वारा एक काव्‍य-वितान तानने में सिद्धहस्‍त कवि की स्‍मृति-चिंताएं आपके तीसरे हिंदी काव्‍य-संग्रह ‘स्‍मृति-गन्‍धा’ में उपस्थित है। अपनी पिछली काव्‍य-कृतियों से रचना-शैली और विषय-चयन में अलग छवि रखने वाली यह कृति देवल की विशिष्‍ट प्रतिभा को प्रकट करने वाली सिद्ध हुई। अपने दुहराये जाने वाले कविता मुहावरे के आसरे देवल ने स्‍मृति के केन्‍द्रीय भाव को नानाविध रचनात्‍मक अनुभवों से समृद्ध किया। ‘अवसान’ काव्‍य-संग्रह 1999 में आया।

देवल के सृजनात्‍मक व्‍यक्तित्‍व की एक खूबी यह भी है कि आपने भारतीय भाषाओं से अपनी भाषा में अनुवाद भी उतने ही रचनात्‍मक किये हैं। हिंदी, ओडि़या, पंजाबी, गुजराती, बांग्‍ला, एवं संस्‍कृ‍त में अब तक आपके दसाधिक अनुवाद प्रकाशित हैं। यही नहीं आधुनिक विचार और लेखन की दृष्टि से अपनी भाषा राजस्‍थानी को समृद्ध करने की ललक ने आपसे विश्‍व साहित्‍य की दो कालजयी कृतियों का अनुवाद भी करवाया। इनमें प्रमुख रूप से फ्यादोर दोस्‍तायेव्‍स्‍की की प्रसिद्ध कृति ‘क्राइम एण्‍ड पनिशमेण्‍ट’ तथा सेम्‍युअल बेकेट की नाट्यकृति ‘वेटिंग फॉर द गोडो’ जो क्रमश: ‘सजा’ और ‘गोडो री उडीक में’ नामों से प्रकाशित होकर प्रशंसा की हकदार बनीं।

अनुवाद के साथ-साथ देवल ने राजस्‍थानी की कुछ महत्‍वपूर्ण मध्‍यकालीन साहित्‍य की कृतियों का सटीक-संपादन भी किया है, जिनमें उल्‍लेखनीय हैं- ईसरदार बारहट रचित ‘गुण हरिरस’ तथा सूर्यमल्‍ल मीसण रचित ‘वंश भास्‍कर’। वंश भास्‍कर की अर्थप्रबोधनी टीका 2007 में 9 खण्‍डों में 7000 से अधिक पृष्‍ठों में प्रकाशित हुई।

‘भारत भासा भागवत’ नामक श्रीमद्भागवत के राजस्‍थानी काव्‍यानुवाद के दो भाग भी आपने संपादित किये हैं।

निरंतर अपनी भाषा और उसके साहित्‍य के विकास की चिंता में संलग्‍न और उसके प्रसार हेतु प्रयासरत चंद्रप्रकाश देवल का नाम समकालीन भारतीय भाषाओं के उल्‍लेखनीय कवियों में विशिष्‍ट है।

मुख्‍य प्रकाशन :-

राजस्‍थानी काव्‍य-संग्रह :-

पागी : 1977

कावड़ : 1989

मारग : 1992

तोपनामा : 1998

उडीक पुरांण : 2003

झुरावौ : 2008

हिंदी काव्‍य संग्रह :-

आर्त्‍तनाद : 1988

बोलो माधवी : 1995

स्‍मृति-गंधा : 1996

अवसान : 1999

अनुवाद :-

उपनिसादावली : सात उपनिषदों के काव्‍यानुवाद सहित, 1990

काळ में कुरजां : केदारनाथ सिंह के हिंदी काव्‍य-संग्रह ‘अकाल में सारस’ का, 1994

कठै ई नीं वठै : अशोक वाजपेयी के हिंदी काव्‍य-संग्रह ‘कहीं नहीं वहीं’ का, 1994

जटायु : शितांशु के गुजराती काव्‍य-संग्रह ‘जटायु’ का, 1995

स्री राधा : रमाकांत रथ के ओडि़या काव्‍य-संग्रह ‘राधा’ का, 1996

सबदां रौ आभौ : सीताकांत महापात्र के ओडि़या काव्‍य-संग्रह ‘शब्‍देर आकाश’ का, 1996

नीं छियां नीं तावड़ौ : हरभजनसिंह के पंजाबी काव्‍य-संग्रह ‘ना धुप्‍पै ना छावै’ का, 1997

लाख पयांणी करूं लांबौ : सुभाष मुखोपाध्‍याय के बांग्‍ला काव्‍रू-संग्रह ‘जत्‍ते दुरई जाई’ का, 1997

सजा : फ्योदोर दोस्‍तोयेव्‍स्‍की के विश्‍व प्रसद्धि उपन्‍यास ‘क्राइम एण्‍ड पनिशमेंट’ का, 1999

गोडो री उडीक में : सेम्‍युअल बेकेट के जग प्रसिद्ध नाटक ‘वेटिंग फॉर द गोडो’ का, 1999

अंग्रेजी संपादन :-

उत्‍तरा (राजस्‍थानी खण्‍ड) : 1992

मेडिवल इंडियन लिटरेचर (राजस्‍थानी खण्‍ड) : 1997

एनसाइक्‍लोपिडिया ऑफ इंडियन लिटरेचर : 2006

संपादन :-

निजराणौ : 1980

भारत भासा भागवत : भाग-1, 1989

भारत भासा भावत : भाग-2, 1992

गुण हरिरस : 1992

पाण्‍डवयशेन्‍दु चन्द्रिका : 2003

वंश भास्‍कर की अर्थप्रबोधिनी टीका : 2007, 9 खण्‍ड-7000 पृष्‍ठ

जीवन-विवरण :-

1949 : 14 अगस्‍त, जन्‍म। राजस्‍थान के उदयपुर जिले के गोटीपा गांव में।

1970 : हिंदी, राजस्‍थानी में कविता लेखन का आरंभ। मदन कंवर से विवाह।

1971 : उदयपुर विश्‍वविद्यालय से विज्ञान संकाय में स्‍नातक।

1973 : जोधपुर विश्‍वविद्यालय से रसायन शास्‍त्र में स्‍नातकोत्‍तर उपाधि।

1975 : जवाहरलाल नेहरू आयुर्विज्ञान महाविद्यालय के जीवरसायन विभाग में नियुक्ति।

1977 : पागी काव्‍य-संग्रह प्रकाशित।

1979 : पागी पर साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार।

1980 : पागी के लिए राजस्‍थानी नेशनल ग्रे‍जुएट एसोसिएशन, मुम्‍बई का पुरस्‍कार।

1983 : अजमेर में ‘चारण साहित्‍य शोध संस्‍थान’ की स्‍थापना।

1987 : जीवरसायन में पीएच-डी।

1989 : कावड़ काव्‍य-संग्रह प्रकाशित और उस पर ‘कालूराम पेडि़वाल पुरस्‍कार’

1990 : प्रथम अनुवाद पुस्‍तक- उपनिसदावली का प्रकाशन। राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी, बीकानेर की कार्य समिति के सदस्‍य। आकाशवाणी, जयपुर की ‘कार्यक्रम सलाहकार समिति’ के सदस्‍य।

1992 : मारग काव्‍य-संग्रह का प्रकाशन। साहित्‍य अकादेमी, दिल्‍ली में राजस्‍थानी भाषा के परामर्श मण्‍डल के सदस्‍य।

1993 : भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता का ‘टांटिया पुरस्‍कार’।

1995 : काळ में कुरजां पर साहित्‍य अकादेमी का अनुवाद पुरस्‍कार। हिंदी में बोलो माधवी प्रकाशित।

1996 : हिंदी कविता संग्रह स्‍मृति-गन्‍धा का प्रकाशन।

1997 : तोपनामा प्रकाशित।

1998 : साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली की राजस्‍थानी भाषा परामर्श समिति के संयोजक। बोलो माधवी के लिए राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी, उदयपुर का सर्वोच्‍च मीरा पुरस्‍कार। तोपनामा पर मारवाड़ी सम्‍मेलन, मुम्‍बई का घनश्‍यामदास सर्राफ पुरस्‍कार। राग विजोग प्रकाशित।

1999 : दिल्‍ली की संस्‍था ‘कथा’ द्वारा ‘बस में रोझ’ कहानी पर रचनात्‍मक लेखन पुरस्‍कार। हिंदी कविता संग्रह अवसान का प्रकाशन।

2003 : बोहरा यूथ एसोसिएशन अवार्ड। उडीक पुरांण प्रकाशित।

2004 : राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी, बीकानेर का सर्वोच्‍च सूर्यमल्‍ल मीसण शिखर पुरस्‍कार।

2006 : रामनिवास आशारानी लखोटिया ट्रस्‍ट, नई दिल्‍ली का लखोटिया पुरस्‍कार।

2007 : वंश भास्‍कर की अर्थप्रबोधिनी टीका का प्रकाशन, 9 खंडों में 7000 पृष्‍ठ।

2008 : काव्‍य-संग्रह झुरावौ का प्रकाशन।  साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली के राजस्‍थानी भाषा परामर्श मण्‍डल समिति के संयोजक।

2009 : कमला गोइन्‍का फाउण्‍डेशन का मातुश्री कमला गोइन्‍का राजस्‍थानी साहित्‍य पुरस्‍कार।

सम्‍प्रति : सेवानिवृत्ति के बाद स्‍वतंत्र लेखन। संयोजक, साहित्‍य अकादेमी राजस्‍थानी भाषा परामर्श मण्‍डल, नई दिल्‍ली।

संपर्क :

74 , बलदेव नगर, माकड़वाली रोड, अजमेर

cpdeval@gmail.com

+ 91 9928140717

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Responses

  1. जय माता जी की सा
    पदम् श्री मिलाना रे मोके पर सम्पुरण चरण समाज की तरफ से आपको हार्दीक बधाई .

    माँ करनी आप ने और कामयबी प्रदान करे .

    भवानी रतनु

    बेंगलुरु
    पली राजस्थान


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